Sunday, October 7, 2012

लीजिये बावफा लिख दिया इक़ किताब

चाहिये दोस्तों अब कितने  जवाब ,
साँस लेने का होता नहीं है हिसाब !

देख कर आपकी नज़र की दुआ ,
भूल जायें जहाँ भर के हम गुलाब 

जाते जाते  था कहकशां का  सबब,

आते आते तो बस सिफ़र  था जनाब! 

जाग कर ख्वाब का सामना कीजिये,
नींद की ज्यादती हो न जाये खराब

आईये कि ये शहर पुकारा करे ,
होंगे अपने गली के भले ही नवाब

सुन साकी कि हमको दो हर्फ़ बहुत,
क्या पैमाना ख़ास ,क्या महंगी शराब

हर घड़ी छोड़ देता है वाजिब सवाल,
ए खुदा! तू भी कितना है लाजवाब

दीजिये नील स्याही काग़ज़ कलम
लीजिये बावफा लिख दिया इक़ किताब

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बावफा : loyal ,कृतज्ञ 
कहकशां : universe
सिफ़र : शुन्य ,zero

Tuesday, October 2, 2012

"मृगतृष्णा "


अपार हर्ष के साथ सूचित कर रहा हूँ की मेरी पुस्तकमृगतृष्णा प्राकशित हुई है
इसमें १० कवियों की अनमोल रचनाएं हैं
आप इसे यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं
साभार 


इन्फीबिम से प्राप्त करें मृगतृष्णा
फ्लीप्कार्ट से प्राप्त करें मृगतृष्णा


Saturday, September 29, 2012

चले जाता है फिर किसी ग़ज़ल की तरह



तब  रोशनाई  आ   गयी  थी   बादल   की  तरह ,
जब  जब  वीरां  पन्ना  लगा  मौकतल  की  तरह 

कोई खिलता है मेरे सर में कमल की तरह ,
चले जाता है फिर किसी ग़ज़ल की तरह


किधर  जाए  वो  मुसाफिर   ,आशियाँ  ढूंढें ,
जब  दिखने  लगे  हर  राह  चम्बल  की  तरह  

होती  है  उसकी  खुशबू  से  ही  चरागारी ,
जो  रहता  है  विषों  के  बीच  संदल  की  तरह 

जब  कभी  परीशां  सी  हो  जाती  है  नींदें  ,
तब  आते  हैं  ख्वाब   किसी  आँचल   की  तरह

वो  आसमां और   ज़मीं  दूर  हैं   मगर  फिर भी ,
साथ हैं  फलक  पे  सदा   अज़ल  की  तरह

कहाँ होती है सोने के तमगो से तसल्ली नील 
नहीं है बात गेहूं की पकी  फसल की तरह 

***
सर : जलाशय 
संदल : चन्दन
मौकतल : execution place, कत्लगाह
परीशां : in trouble,anxious,परेशानी  में
अज़ल : eternity,without any beginning,अनादी 
फलक  :क्षितिज  ,horizon

Saturday, July 7, 2012

ले चलो

मेरे ख्वाब मुझे दूर बहुत दूर ले चलो ,
जहाँ "मैं " न रहे कहीं ,ओ ! हुज़ूर ले चलो 

या बना दो इक तश्वीर ,बसा दो इक शहर 
तुम मेरे रंग और काग़ज़ बदस्तूर ले चलो 

तुम जाना लहर में बिन नाव , लेकिन मेरे अज़ीज़
अपने साथ मेरी दुआयें भरपूर ले चलो

तुम मेरे गुरूर को फ़ना कर दो मगर सुन लो
मेरे घर में है रब का ज़रा सा नूर , ले चलो

नीम और मधु में कोई भेद क्या हो "नील "
है हर चरागारी हमें मंज़ूर ,ले चलो 

Saturday, June 30, 2012

तुम फिर कब ये बोलोगे


तुम  फिर  कब  ये   बोलोगे  की  मैं  ज़रा  ज़रा  बोलूं ,
कि  बहुत  देर  हुई  जागे  ,थोडा  मैं  भी  सो  लूं 

वो  रूठना  का  दौर  ,वो  मनाने  की  ज़द्दोज़हत 
वो  तेरा   देखना , तेरे  वास्ते   संदूक   जब  खोलूं 

वो  तेरी  मासूमियत  ,वो  सादगी ,आवाज़  का  जादू 
जी  चाहता   था  तेरे  सामने  जी  भर   के  रो  लूं 

अब  मेरे  दरीचे  के  सामने  इक  दरख़्त   खड़ा  रहे 
झूला  जब  कभी टंगे ,  मैं  बीते  पन्नो  को  टटोलूं   !

मेरे  दश्त   में  तेरी  पुरवाई  की  महक  अब  भी  बसे 
मैं  तेरी  याद  से  हर्फों  की  अमराई   में  रस   घोलूँ  !!

कभी  तेरे  ख्यालों  में  कभी  टेढ़े  सवालों  में 
घड़ी  घड़ी  डगर  डगर  मन  थाम  के  डोलूँ  !!

Sunday, June 24, 2012

नील आँखें खुद बा खुद इक नज़्म कह देंगी तुम्हे , बिना लिखे बिना पढ़े


तुम  पूछते  हो  की  मैंने  क्या  लिखा  ,तो  कभी  हर्फों  को  भूल   कर  हमें  देखो  
तुम  सोचते  हो  की  मैंने  क्यूँ  लिखा  ,तो  मेरी   भी   बहुत  हैं  उलझने  देखो  !!


क्यूँ  मैंने  दर्द  में  भी  ख़ुशी  लिखी  ,क्यूँ  वही  शम्मा -ए -महफ़िल  लिखी 
तो  आकर  मेरे  अजीजों , मेरे  जान - ओ - जिगर  के  पयामो  के  सिलसिले  देखो  !!

हुज़ूर  कुछ  पल  की   है  जिंदगानी ,हर  मोड़  पे  है  उस  रब  की  ही  मेहेरबानी 
तुम  देख  लो  मेरी  रोशनाई  का  सादापन  ,तुम  मत  महज़  कुछ  पन्ने  देखो  !!

आज  बाग़ -ऐ -बुलबुल  में  कई  किलकारियाँ  ,सावन  के  झूले  ,शोखियाँ  हैं 
मगर  दूर  कहीं  बागवाँ  बंज़र  सी   ज़मीं  पे  बो  रहा  है  फसले  देखो  !!

नील  आँखें   खुद  बा  खुद  इक  नज़्म   कह  देंगी  तुम्हे , बिना  लिखे  बिना  पढ़े ,
वो  लड़  रही  हैं  तीरगी  से  खुद  बा  खुद  कितने  ही  मुकदमे  देखो  !!

Saturday, June 16, 2012

तश्वीर मैं बनाऊंगा तू करना ये इनायत

मुस्कुराता हुआ चेहरा ,गम से दूर कर दे 
ये ज़िन्दगी जब भी बहुत मजबूर कर दे 

हर वक़्त मौकतल में ही जैसे खड़ा मिला 
मेरी दास्ताँ न दश्त में कसूर कर दे 

मेरे मौला मेरे दामन में ज़रा ज़रा देना
कब माँग थी मेरी तू भरपूर कर दे

तश्वीर मैं बनाऊंगा तू करना ये इनायत
अपनी नज़र का इसमें थोडा नूर कर दे

नील सागर से न मांगे मोतियों की भीख
उसके आँख में वफ़ा का गुरूर कर दे

कब वो संगदिल बन गया

जाने  कहाँ  ,कब  मिला और कब वो  संगदिल बन गया  दफन  थे  हर  गम जो  , अब  राज़-ए-दिल  बन  गया  ज़माने  ने  खुदगर्जी  का  कुछ  ऐसा  सिला ...