Sunday, October 7, 2012

लीजिये बावफा लिख दिया इक़ किताब

चाहिये दोस्तों अब कितने  जवाब ,
साँस लेने का होता नहीं है हिसाब !

देख कर आपकी नज़र की दुआ ,
भूल जायें जहाँ भर के हम गुलाब 

जाते जाते  था कहकशां का  सबब,

आते आते तो बस सिफ़र  था जनाब! 

जाग कर ख्वाब का सामना कीजिये,
नींद की ज्यादती हो न जाये खराब

आईये कि ये शहर पुकारा करे ,
होंगे अपने गली के भले ही नवाब

सुन साकी कि हमको दो हर्फ़ बहुत,
क्या पैमाना ख़ास ,क्या महंगी शराब

हर घड़ी छोड़ देता है वाजिब सवाल,
ए खुदा! तू भी कितना है लाजवाब

दीजिये नील स्याही काग़ज़ कलम
लीजिये बावफा लिख दिया इक़ किताब

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बावफा : loyal ,कृतज्ञ 
कहकशां : universe
सिफ़र : शुन्य ,zero

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